कर्म के उत्सव हैं कृष्ण

कृष्ण  जीवन को  काम की तरह नहीं आनन्द की तरह लेते हैं !काम उत्सव के रंग में  रंग जाता हैं ! कृष्ण अकेले ही एसे हैं जो धर्म की परम गहराइयों और उचाइयो पर होकर भी गंभीर नहीं हैं ! उदास नहीं हैं ! कृष्ण कहते हैं कि तुम अपने गुरु बने रहना !कृष्ण चुनाव रहित हैं ! समग्र हैं और इसलिए पूर्ण हैं ! कृष्ण के योग का एक ही आदर्श हैं अखंड हो जाना इसलिए कृष्ण को महायोगी कहा जाता हैं ! कृष्ण युद्ध वादी नहीं हैं किसी को मिटाने की कोई आकांशा नहीं हैं ! किसी को दुःख देने का कोई ख्याल नहीं हैं ! वे यथार्थवादी हैं ! वे जीवन की और सत्य की और धर्म की कीमत पर युद्ध को बचाने के लिए राजी न थे ! कृष्ण जैसे व्यक्तित्व की फिर जरुरत हैं जो कहते हैं शुभ को भी लड़ना चाहिए ! कृष्ण कहते हैं निर्णयात्मक बनो निश्चात्मक कहो !  सबसे बड़ी बात जो कृष्ण ने सीखाई वो हैं कर्म करते रहना ! गीता में जोर देकर उन्होंने कहा कि कर्म करने के अतिरिक्त मनुष्य के लिए मुक्ति का कोई और मार्ग नहीं हैं !जो काम करो पूरी इमानदारी से करो !यही सफलता का सूत्र हैं अपने बड़े बुजुर्गो का सम्मान करने में कृष्ण का कोई सानी नहीं ! इसके उदारहण महाभारत में मिलते हैं ! मित्रता के महत्व को कृष्ण के  व्यक्तित्व से सीखा जा सकता हैं ! उनके मन में ओरतो के लिए बहुत सम्मान था !  कृष्ण ने राधा से प्रेम में अपने नाम को गौण कर लिया और राधा को अपने नाम से पहले सम्मान दिया ! उनमे स्त्रियों के प्रति प्रेम और आदर का एक गहरा समुद्र था  जिसको चाहना किसी के लिए भी असंभव था ! कृष्ण के जीवन में दुविधा नहीं थी उनके विचार स्पष्ट और खुले हुए थे ! कृष्ण आज भी हमे किसी न किसी रूप में प्रेरणा दे रहे हैं ! सवाल उन प्रेरणाओ से लाभ उठाने का हैं ! कृष्ण विशेष प्रतिभा और गुणों से युक्त होते हुए भी जनसाधारण के बीच रहे  और उन्ही के समान  आचरण करते हैं लेकिन कही भी पराजय स्वीकार नहीं करते हैं ! कृष्ण माया मोह के बंधन से दूर हैं ! कर्त्तव्य पालन उनके लिए सर्वोच्च हैं ! संकट की हर घडी में कृष्ण निर्विकार और अडिग बने रहे इसलिए  कृष्ण योगीश्वर कहलाते  हैं ! कृष्ण कहते हैं अपने जीवन से भागो मत ,अपने को बदलो ,मुकाबला करो और अपने विधाता स्वयं बनो का पाठ सिखाते  हैं

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