नारी और आत्म सम्मान|Women Empowerment

                                                 
नारी और आत्म सम्मान
 
 आज  21 वी सदी के आधुनिक युग में महिलाओं ने अपने आप को हर क्षेत्र में साबित किया है।प्राचीन मिथकों को तोड
ते हुए महिलाएं पुरुष वर्चस्व वाले रोजगार के क्षेत्रों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा चुकी हैं।हर क्षेत्र में महिलाएं पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर कार्य कर रही है।

आज की नारी में आत्मविश्वास जागा हैं।बीसवीं शताब्दी से  भारतीय नारी अपनी वर्जनाओं को तोड़ सशक्त और आत्मनिर्भर हो चली हैं। शिक्षा के विकास के कारण नारी की जड़ चेतना में बड़ा परिवर्तन आया हैं।राजनीति में भी घरेलू महिलाये अपनी प्रभावी भूमिका निभा रही हैं। नारी ने अपना व्यक्तित्व प्राप्त कर लिया हैं इसे अब किसी के साथ की जरूरत नही।अगर दूसरे परिप्रेक्ष्य में देखे तो आज की नारी पछिमी सभ्यता से प्रभावित हो रही हैं।
 नारी की गरिमा का सुरक्षित रहना जरूरी हैं ।नारी संसार की जननी है  मातृत्व बाकी सबसे बड़ी  साधना हैं।नारी अपनी अस्मिता के प्रति पहले से अधिक सतर्क हैं।
” मै बेहिसाब निर्बाध बांहे फैलाऊंगी ।मैं खुली हवा में साँसे लेना चाहती हूँ।अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहती हूँ ।आज की नारी में शोषण से मुक्ति पाने की छटपटाहट साफ नजर आ रही हैं।आज की नारी सबल ऊर्जावान निर्भीक हैं।वह अपने हक के लिए खड़ा होना सीख रही हैं।वह स्पष्टवादी हैं कही पर भी कुंठाग्रस्त नही हैं।आधुनिक नारी अपने स्वाभिमान की रक्षा करना जानती हैं।शिक्षा और अर्थिक स्वतंत्रता ने नारी को एक नई दिशा दी हैं।उसमें जीने के लिए साहस पैदा हुआ हैं।वह लड़ जाना चाहती हैं।: पुरुषों को इस प्रकार का वातावरण तैयार करना होगा जिसमें नारी को राष्ट्र की सृजनहार समझा जाये।न कि मात्र भार्या।नारी की स्थति बड़ी अजीब हैं एक तरफ तो वह स्वतंत्र नज़र आती हैं दूसरी तरफ वो घुटन भरी  जिंदगी जीने को मजबूर हैं।
इतनी कामयाबी के बाद भी उन्हें अपने परिवार से वो सहयोग नहीं मिलता जो उन्हें मिलना चाहिए।    आज महिलाएं शिक्षा, स्वास्थ्य, पत्रकारिता, कानून, चिकित्सा और आदि क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दे रही है।     
 जिससे उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति को मजबूत किया है और वे सुदृढ हुई है।उनके सम्मान और हैसियत में इजाफा हुआ है। 
 पर नहीं कुछ बदला है तो वह है घर गृहस्थी के काम, खाना बनाना, बच्चे संभालना। यानि महिलाओं को दोहरी जिम्मेदारी निभानी पडती है।  जिससे उन पर दोहरी मार पडती है।
 एक तो अपने कार्य क्षेत्र का तनाव, और पुरुषों द्वारा अपमानित करना।
एक महिला कितनी ही गुणी और लायक क्यों न हो पुरुष उसे हमेशा नीचा दिखाने की कोशिश में लगे रहते हैं।
7-8 घंटे तक काम करना फिर बसों, आटो में धक्के खा कर थकी हारी घर आना, और फिर घर के काम करना, खाना बनाना, बच्चों की देखभाल करना ।जिससे वह बुरी तरह थक जाती है। वह अपनी घर और ऑफिस की जिम्मेदारी को ठीक तरह से निभाने के लिए अपनी क्षमता से अधिक कार्य करती है।पर सभी की कुछ न कुछ शिकायतें रहती हैं, 
और वह अपने खानपान का ध्यान नहीं रख पाती ।
और  जिससे उसके ऊपर दोहरा तनाव पडता है।उसको अनेक शारीरिक और मानसिक    बीमारियां जैसे मोटापा, रक्तचाप, शुगर और अवसाद से घिर जाती है।पर अपनी इस हालत की जिम्मेदार कहीं न कहीं वह स्वयं ही होती है।
जिस प्रकार घर के लोगों के प्रति ध्यान रखना उसकी प्राथमिक ता होती है,।
 उसी तरह उसे अपने खानपान ,तबियत और आराम का भी ध्यान रखना चाहिए।अपने लिए समय निकाल ना चाहिए। 
अपने सपनों  इच्छाओं और तमन्नाओं को पूरा करने के लिए हर संभव कोशिश करनी चाहिए ।
सबसे पहले उसे अपना स्वयं का सम्मान करना होगा। जब तक वह स्वयं अपना सम्मान नहीं करेगी किसी दूसरे से क्या अपेक्षा कर सकती है ।       
  घर के सभी सदस्यों को इसमें सहयोग करना चाहिए, ।जहां तक हो सके उनके कामों में सहयोग करना चाहिए।जिससे वह भी स्वस्थ और तनाव मुक्त रहकर अपनी दोहरी भूमिका निभा सके।                
  क्योंकि एक स्वास्थ्य महिला ही स्वास्थ्य परिवार, स्वास्थ्य समाज का निर्माण कर सकती है जिससे एक स्वास्थ्य और विकसित राष्ट्र का निर्माण ho
neera jain   writer

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