नारी सशक्तिकरण|Women Empowerment स्त्रीशक्ति का प्रतीक है

 नारी सशक्तिकरण

 

सृजन, पालन और संहार । ये तीन गुण हैं आदिशक्ति के या यूं कहें कि तीन चिंतन हैं जगत जननी लीला विहारिणी माँ दुर्गे के । जब वह सृजन करती हैं या पालनहार के रूप में होती हैं तो ममतामयी माँ का स्वरूप लिए होती हैं । लेकिन जब वे महिषासुर जैसे राक्षसों का भार दुनिया से हटाने के लिए प्रतिबद्ध होती हैं तो अपने भीतर की शक्ति को जाग्रत करके असीम शक्तिवान स्वरूपा में परिवर्तित हो जाती हैं । माँ का यह रूप स्त्रीशक्ति का प्रतीक है, c। अपने गर्भ में पाल-पोष कर हमें इस दुनिया में लाने के लिए स्त्री के रूप में जननी ही जिम्मेदार है ।

यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता ॥

   आज महिलाएं हर वो कीर्तिमान रच और तोड़ रही हैं जिनकी कभी कल्पना नहीं की जाती थी । सुनीता विलियम्स अन्तरिक्ष में सबसे ज्यादा समय बिताती हैं तो मलाला यूसुफजई तालिबानी सोच से खुली बगावत कर लेती हैं ।

इसके बावजूद तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है जिसमें महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों की लंबी फेहरिस्त है । उम्र के हर पड़ाव पर उन्हें इनसे दो-चार होना पड़ रहा है । कन्या भ्रूण-हत्या, लैंगिक भेदभाव, बाल-विवाह, वेश्यावृत्ति, यौन-हिंसा, ऑनर किलिंग, दहेज-हत्या, घरेलू-हिंसा, दफ्तर में यौन-उत्पीड़न, विधवा का जीवन और बुढ़ापे में परित्यक्त का जीवन जीने को वे अभिशप्त हैं । नारी को साक्षात देवी मानकर उनकी पूजा करने वाले देश में उनकी यह हालत आधुनिक समाज के माथे पर बड़ा कलंक है । दिल्ली-हादसे के बाद भी सबक नहीं ले सका है देश और खोखली कानूनी-कवायदों के बीच बढ़ती जा रही है स्त्रियों के उत्पीड़न की सूची । देशव्यापी विरोध-प्रदर्शनों के बावजूद अगर  अपराधियों के मंसूबे कम नहीं हो रहे हैं तो क्यों ना माना जाए कि उनके गिरहबान तक पहुँचने में काँपते हैं सत्ता के हाथ और बस दिखावटी ही हैं क़ानूनों के खौफनाक दाँत । जैसे-जैसे हम विकास की ओर अग्रसर हो रहे हैं और महिलाओं के प्रति अपराधों के संदर्भ में कानून कड़े होते जा रहे हैं वैसे-वैसे अन्य अपराधों के साथ दुष्कर्म के मामले भी बढ़ते जा रहे हैं । इसके पीछे सबसे बड़ा कारण है महिलाओं को भोग की वस्तु मानने की प्रवृत्ति जो दुर्भाग्यवश हमारे समाज के साथ-साथ पुलिस और बेशक न्याय-तंत्र में भी भरी हुयी है । तमाम कायदे-कानूनों को दरकिनार कर थानों में पीड़ित से बेहूदा सवाल पूछे जाते है । पुलिस जैसे पूरे मामले में मजे लेती नजर आती है । दूसरी तरफ अदालतों की सहानुभूति पीड़ित के साथ ना होकर दोषी के साथ ही होती है । सज़ा देते समय दोषी की उम्र, कुछ मामलों में उसकी गरीबी, परिवार के एकमात्र कमाऊ पुरुष आदि दलीलों पर अदालत बड़ी उदारता और सहानुभूतिपूर्वक विचार करती है । यह देश के लिए शर्म की बात है कि अधिकांश मामलों में अपराधी पर आरोप सिद्ध ही नहीं हो पाता और आरोपी बाइज्जत बरी हो जाते हैं । कभी-कभी तो ऐसा लगता है जैसे आरोपी से लेकर अदालती-कार्यवाही तक पूरा तंत्र स्त्री-विरोधी है ।

आखिर कैसे लगेगी महिलाओं के विरुद्ध इस शोषण पर लगाम और कैसे रुकेगा यह अत्याचार, 

  1. क्या है महिलाओं की ठोस मांग ?
  2. क्या हो इस पर अमल का एजेंडा ?
  3. कैसे सुधारा जा सकता है सिस्टम ?
  4. महिलाएं क्या चाहती हैं कि उनकी सुरक्षा के लिए क्या उपाय किए जाएँ ?
  5. सुरक्षा के लिए जिम्मेदार लोग ही असुरक्षा का माहौल पैदा करें तो उन पर अंकुश कैसे लगे ?

    बेशक ये तलाश पूरी भी हुयी और ठोस बुनियाद लिए हुये जवाबों      की फेहरिस्त आपके समक्ष अवश्य रखना चाहूंगी –

  1. महिलाओं के विरुद्ध होने वाले अपराधों के लिए अपराधियों को सज़ा चुपचाप नहीं बल्कि जनता के सामने मिलनी चाहिए । इंसाफ में देरी का अंत हो इसके लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनने चाहिए और उनमे त्वरित कार्यवाही होनी चाहिए ।
  2. महिलाओं के लिए बनने वाली अदालतों में न्यायधीश भी महिलाएं ही होनी चाहिए । पुलिस में अधिक संख्या में महिलाओं की भर्ती की जाए । महिलाओं की सुरक्षा के लिए जितने भी कानून हैं उनकी जानकारी महिलाओं को देनी चाहिए ।
  3. स्थिति में तभी सुधार होगा जब सरकार, पुलिस और न्यायपालिका औरतों के पक्ष में काम करना प्रारम्भ करे । सिस्टम की जवाबदेही तय हो । हाँ, समाज को भी अपने कर्तव्य के प्रति जागरूक होना होगा । सिविल सोसाइटी को एक्टिव रोल में रहना होगा 
  4. महिलाओं की ठोस मांगें हैं कि न्यायिक-प्रक्रिया तेज हो, दोषियों को तुरंत और सख्त सज़ा मिले । आरोपियों पर शिकंजा कसने के लिए सरकार को फांसी तक की सज़ा से भी गुरेज नहीं करना चाहिए । महिलाओं की सुरक्षा देश का पहला एजेंडा होना चाहिए 
  5. रक्षक से भक्षक बने लोगों के खिलाफ महिलाएं गोलबंद हों और प्रशासन व कानून भी संवेदनशील हो । यदि कोई प्रशासनिक व्यक्ति लापरवाही के आरोप में पकड़ा जाए तो उसे नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाए । महिलाओं के खिलाफ बेहूदा बयानों पर माफी मँगवाई जाए ।

अस्मिता, सुरक्षा और स्वाभिमान की लड़ाई में स्त्रियाँ काफी आगे निकल आई हैं । लेकिन उन्हें पीछे धकेलने के तमाम हथकंडे भी आजमाए जा रहे हैं । कभी फतवे दिये जाते हैं तो कभी तुगलकी फरमान… । मुख्य भूमिका में आती स्त्री को हाशिये पर ले जाने की रोज नयी-नयी तकनीकें ईज़ाद की जा रही हैं । स्त्री के लिए कैसे एक सुरक्षित व सम्मानजनक माहौल तैयार किया जा सकता है ?आवश्यकता है सही सोच से इस सूरत को बदलने की । हमें इस बात का जवाब अपने समाज से ही निकालना होगा कि एक पीड़ित महिला को दुष्कर्मी से भी बड़ा अपराधी क्यों मान लिया जाता ह

आज भी परिवार है संस्कारों की पहली पाठशाला और इसी का आईना होता है हमारा समाज । स्त्रियों के प्रति संवेदनशीलता के बीज बचपन में ही बोये जाए ।

 “ आज यह दीवार पर्दों की तरह हिलने लगी

शर्त लेकिन थी ये, बुनियाद हिलनी चाहिए ।

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही

हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए  है ।

 

 

 

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