स्मार्ट फोन ओर सोशल मीडिया से बच्चो में बढ़ रहा डिप्रेशन | Social Media Article

                स्मार्ट फोन ओर सोशल मीडिया से बच्चो में बढ़ रहा डिप्रेशन
 
 
 ये सच हैं कि स्मार्ट फ़ोन और सोशल मीडिया के यूज़ से बच्चो में डिप्रेशन बढ़ रहा हैं इसकी वजह से वो परिवार से दूर होकर नितांत अकेले होते जा रहे हैं और इससे उनके स्वास्थय पर गहरा असर पद रहा हैं ये बेहद चिंताजनक हैं।
मीडिया डिवाइसेस से अलग हैं।जिनके साथ सोशल मीडिया तक बच्चो की आसान पहुंच उनके एक दूसरे से बातचीत ओर खाली समय बिताने के तरीके को प्रभावित कर रहा हूं।कुछ विशेषज्ञ का मानना हैं कि अभी हालात ऐसे नही हैं ki स्मार्ट फ़ोन के असर की चिंता की जाए ।लेकिन बच्चो के  भावनात्मक ओर मानसिक विकास के लिए उस पर ध्यान देने की जरूरत हैं.
 
बच्चो के मानसिक।स्वास्थ्य के मौजूद आंकड़े भी इस बहस को हवा देते हैं।डिपार्टमेंट ऑफ हेल्थ ओर ह्यूमन सर्विसेस के अनुसार 2010 से 2016 के बीच  डिप्रैशन का शिकार हुए किशोरो की संख्या में 60 फीसदी का इजाफा हुआ ।करीब 13 फीसदी किशोरों को कम से कम एक बार डिप्रैशन की ग्सम्भीर समस्या का सामना करना पड़ा।2010 में यह आंकड़ा 8 फीसदी था ।10 से 19 साल के लीगो द्वारा आत्महत्याओ में भी वृद्धि हुई।सेंटर फॉर डिसीस कंट्रोल एंड डिप्रैशन के मुताबिक काम उम्र में लड़कियों की आत्महत्या की दर पिछ्ले चालीस वर्षो में सबसे ज्यादा स्तर पर हैं।जबकि 1900 ओर 2000 केदशक में किशोरों म डिप्रैशन ओर आत्महत्या की दर या तो स्थिर रही या उसमे कमी आयी।
 
 
सेन डिएगो यूनिवरसिटी में सायकोलोजी की प्रोफेसर जीन टंवेज ने अपनी किराब आईजेन में उसकी चर्चा की हैं।वे बताती हूं कि  मोबाइल डिवाइसेस से लैस आजकल के बच्चे पहले के बच्चो के मुकाबले कम खुश हैं।ओर वयस्क होने के लिए कम तैयार भी हैं।उन्होंने बताया 2010 के बाद डिजिटल डिवाइस पर ज्यादा समय बिताने वाले बच्चो को।पहले के मुकाबले मानसिक समसया ज्यादा होने की आशंका हैं।दिन में तीन घंटे से ज्यादा समय स्मार्ट फ़ोन ओर इलेक्ट्रिनिक्स डिवाइसेस के साथ बिताने वाले बच्चों को कम से कम एक बार आत्महत्या संबंधित विचार आने की संभावना 34 फीसदी ज्यादा होती हैं।किशोरो के मानसिक विकास की जो जानकारी पहले से मौजूद हैं वह यही बताता हैं कि ओर दिन इंटरनेट के इस्तेमाल की छूट बेहद खतरनाक हो सकता हैं

 
 


   

मोबाइल डिवाइस से बच्चो के मानसिक स्वास्थय ओर सामाजिक व्यवहार पर बुरा असर 

 

 
 
 
किशोर अवस्था मे मस्तिष्क लगातार विकसित होता हैं कुछ रिसर्च में बताया गया हैं कि मल्टी टास्किंग जैसे एक साथ मैसेज करने सोशल मीडिया और एप का इस्तेमाल करने से मस्तिष्क के भावनाओ की प्रोसेसिंग ओर निर्णय लेने की क्षमता कमजोर होती हैं।जेनसन कहते हूं कि वयस्कओ के मुकाबले किशोरो के आकलन ओर खुद पर नुरने की क्षमता कमजोर होती हैं।इससे इंटरनेट पर मौजूद खराब कमेंट की ओर अजर्षित होने और उसका अबभयस्त होने की संभावना बढती हैं।कुछ रिसर्च में यह भी बताया गया है किस्मर्टफ़ोने और सोशल मीडिया के इस्तेमाल से मिलने वाली खुशी डोपामाइन हर्मिने जैसी होती हैं।यही कारण हैं कि इससे दूर हिने पर वे अशांत थकान ओर चिड़चिड़ाहट महसूस करते हूं।किशोरो में डिपरेशन बढ़ने के कई कारण हो सकते हैं एक्स्ट्रा करिकुलर गतिवधियों मे बेहतर
प्रदर्शन से लेकर अच्छे कॉलेज में एडमिशन का दवाब उनके ऊपर हैंलेकिन स्मार्ट फ़ोन का विरोध नही  जरने वाले विशेषज्ञों मानते हैं कि इसकी बडी भूमिका भी हो सकती हैं और इसलिए युवाओं द्वारा इसके इस्तेमाल पर बंदिशे होनी चाहिए।

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