आदरणीय  पिता डॉ रमेश जैन जैन और माँ  सुलोचना जैन की शादी की 50  वी वर्षगांठ गोल्डन जुबली  पर मन्न के  उदगार 

 

माता-पिता से ज्यादा महत्वपूर्ण कोई और नही हो सकता वो ही हमारे पहले गुरू होते हैं और हमारा ये कर्त्तव्य है कि हम उनको भगवान का दर्जा दें ….पिता   क्या कहूँ  ? पिता मेरा संबल है कभी मुझसे कुछ नही कहते पर हमेशा मुझे लगता बहुर्त प्यार करते मुझसे आज मुझे जो पहचान और नाम मिला वी सिर्फ उनके द्वारा दी गईं शिक्षा और संस्कारी की बदौलत ।मेरे अंदर इतना जो आर्मविश्वास ओर उत्साह ऊर्जा है ये सब उन्ही की देन है ।मेरे आदर्श है मेरे पिता।। पिता डॉ  रमेश जैन कोटा खुला विश्व विद्यालय में हेड ऑफ डिपार्टमेंट ऑफ़ जर्नलिज्म रहे पत्रकारिता विषय पर उनकी बहुत सी पुस्तके प्रकाशित हुई। राज्य और राष्ट्रीय स्तर  के बहुत से पुरस्कार उन्हें मिले। पिता डॉ रमेश जैन सरल और सहज व्यक्तित्व के धनि और शायद उन्हें में धुन के धनि भी कहती हु जो इरादा कर लिया उसको पूरा करना ।

जीवन देने वाले माता पिता का गुरु से ज्यादा महत्व है क्योंकि गुरु  ही उसी शरीर मे उपलब्ध हुये है जो मुझे मेरे माता पिता से मिला है सुनहरी धूप में खुद को तपा हमे कच्ची  मिट्टी से मजबूत साँचे में ढाला है वो है पिता ख़ुद के पेट को काट जिसने हमारे पेट को भरा दर्द में मजबूती के साथ हमारा हाथ थामा जिसने हमे हिम्मत और सहारा दिया हमारी जिंदगी को।संवारा मेरे लिए बस वो ख़ुदा है बस वो मेरे पिता मेरे पिता मेरी ताकत है सम्मान है मेरी पहचान है। एक ऐसी छाव जिसने सूरज के ताप को इस तरह छिपा रखा है कि हमे रोशनी  मिले ऊर्जा मिले  गर्मी नही पिता पूरा खज़ाना है जो सिर्फ लुटाते है
पिता की हमेशा ऋणी रहूंगी आज मेरी पहचान मेरी खुशी मेरा अस्तित्व उनकी वजह से है पिता की हर बात एक सुझाव हर हाँ के हर ना के सभी मायने समझ मे आ रहे है। पिता अपने बच्चो की बांहे थामे स्कूल कॉलेज कोचिंग क्लास यहाँ तक परीक्षा केंद्र भी ले जाते है
 परिंदों के बच्चे घोसलों से फेके जाने पर ही उड़ना सीखते है न किन कि उनके कंधों पर बैठकर सैर करने से।।।पिता स्वय में  एक ऐसा शब्द है जो पूर्णता का घोतक है पिता जीवन के सरपंच है अपने बच्चो को नेक राह पर चलने की प्रेरणा जोदेते है जो ममता का अनजाना ऒर अनदेखा रूप होता है जिनकी गैर मौजूदगी बहुत कुछ बयान कर देती है बहुत दूर जाना पड़ता है पिता से पिता जैसा होने के लिये
गुरु हमारे जीवन मे होते है तो हमारे जीवन को एक राह मिल जाती है मेरे पिता को मैने अपना गुरु माना है उनके दिये संस्कारो से ही मैं आगे बढ़ी हूँ बहुत कुछ मैं अपने पिता जैसी हूँ  उनका अक्स हूँ
पिता आम आदमी की रारह रहते है आज मैं यह कह सकती हूं  मेरे पिता की खास आदत यह है कि वे आम आदमी की तरह रहते है  साधारण दिखते है वो भीड़ में नज़र आना नही चाहते आम आदमी की बेटी हूँ मेरे पिता की यह पहचान उनको अलग बनाती है। वे एक ऐसा छायादार वृक्ष है जो धूप में खड़े होकर अपने परिवार को सुखद छाया देते है।
स्नेह में डूबा पिता का चेहरा बहुत अदृश्य रहता है।वे ज्यादातर जगह सख्त ओर खुरदुरे नज़र आते है लेकिन मन के भीतर सरलतम होते है पिता। ।पिता प्रकृति का  सत्य है और प्रकृति का मतलब ही है सुख सकारत्मकता संरक्षण।
: पिता हर हाल में खैरख्वाह है। पिता बदलते नही है वे मौन हो जाते है पिता के होने से जो।आश्वस्ति औलाद को मिलती है वो संसार मे कोई और दूसरी वस्तु नही दे सकती। मंगलेश डबराल लिखते है को सारी लड़ाईया तुम लड़ते थे और जीतता में था। पिता का प्रेम ईश्वर की तरह होता है दिखाई नही देता उनकी सोच इच्छा कमाई सब  परिवार तक सीमित रह ग
neera jain
jaipur
मेरे पिता मेरे गुरु को नमन