आधी आबादी को पूरा हक़ कब

राजनीति में पुरुषवादी सोच हावी रही है  राजनीति में महिलाओ को आगे आने का अवसर नही मिलता।किसी भी देश मे महिलाओ की राजनीतिक स्थति पहुँच एवं प्रभाव पुरुषों के बराबर नही है। महिलाओ के आरक्षण की बात तो राजनीतिक दल करते है लेकिन  कुछ पार्टियों के रवैये के चलते महिला आरक्षण बिल लंबित पड़ा है
 सियासी  दलों के एजेंडे में  महिलाओ से जुड़े मुद्दे काफी पीछे रह जाते है। सबसे बड़ी बात यह है कि देश मे कोई भी पार्टी महिलाओ  को वोट बैंक के तौर पर नही मानती है।राजनीति में  प्रत्येकसफल  पुरुष के पीछे एक महिला ही है जिसे स्वयं अवसरीं से वंचित होना पड़ता है। महिलाए विश्व की आधे से भी अधिक आबादी का प्रतिनिधित्व  करती है
 सबसे बड़ा सवाल यह है कि राजनीति में  आधी आबादी को।पूरा हक कब मिलेगा।। देश की आधी आबादी राजनीति के क्षेत्र में  कहा है और अभी इसे कितनी दूरी तय करनी है आधी आबादी के कथन को कथन में चरितार्थ करने में।सयुंक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत जैसे देशों में महिलाओ की भागीदारी राजनीति में इसी तरह से रही तो लिंग असंतुलन  को पाटने में 50 वर्ष से अधिक लग जाएंगे
: देश मे आधी आबादी अभी भी हाशिये पर है  पार्टियों में महिला कार्यकर्ताओ से न केवल महिला सम्बन्धी विषयो पर कार्य कराया जाता है जब देश की नीतियों और महत्वपूर्ण फैसले करने की बारी आती है तो महिलाओ की भूमिका न के बराबर होती है। पार्टियां महिलाओ को।लोक सभा चुनाव लड़ने के लिए  टिकिट नही देती है लेकिन जब भी महिलाओ को यहाँ जितना थोड़ा अवसर मिला उन्होंने अपनी प्रतिभा दिखाई।
 अभी हाल में ही हुए विधानसभा चुनावों में  राज्यो में मतदान करने में महिलाएं पुरुषों से आगे रही है।आज महिलाओ में राजनीतिक चेतना तेजी से बढ़ रही है ये चुनावी आकड़ो से पता चलता है  आज महिलाए स्वतंत्र है वो स्वतंत्र निर्णय लेती है जब मतदान होता है अपनी इच्छा से योग्य प्रतिनिधि का चुनाव करती है।अब समय आ गया है  कि आधी आबादी को भी राजनीति में  भागीदारी पुरूषों के समान अवसर मिले 
उसका यह सपना कही सपना बनकर न रह जाये क्योंकि आधी आबादी  भी देश समाज और  राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है 
नारी कमजोर नहीं
नारी कमजोर नहीं
न ही कम है
कर रही निरंतर सधंर्ष है।
उठने के लिए बढ़ने के लिए
आसमान छूने के लिये
 अपनी पहचान बनाने 
जूझ रही है अभाव की आधियों के थपेडों से 
अपनो क तानों से
गैरौ की तीखी चुभती भूखी नजरों से,
वो लड़ती है जूझती है
लड़खड़ाती है
गिरती है और संभलती है
अपनी कोमलता के साथ
अपने इरादों को देती मजबूती
अपने संस्कारों को,अपनी जड़ों को
 थामा है मजबूती से,
अडिग अचल रहकर,
नित जीवन पथ पर बढ़ती।
उसे विश्वास है एक दिन
मिलेगा संबल,
और अपने इरादों को सहारा
नारी न कमतर है न ही कमजोर