कँहानी

               लंबा इंतज़ार

आज  जानकी देवी बहुत खुश है।करीब पाँच वर्ष बाद उनका बेटा ऑस्ट्रेलिया से आ रहा है वहाँ मेरी बहू और पोता भी है।जबसे ऑस्ट्रेलिया गया है उसको देखने को ये आँखे तरस गई है उसको देखा ही नही । घर मे झाड़ू पोछा करने वाली बाई कहने लगी “अम्मा तुम अकेले रहती हो तुम्हारे आगे पीछे कोई नही बेटा आ जायेगा वो तुम्हारा ख्याल रखेगा’ अम्मा बोली हा आज ही बेटे वरुण को फोन लगाया है तीन चार दिन में आ जायेग…..
बाई  मुसकुराते हुए बोली “अम्मा कोई काम हो तो बताना अब हम चलते है”जानकी देवी ने सर हिलाया हा हा ठीक  है।
: जानकी देवी सच मे वहुत खुश है।वरुण उनका इकलौता बेटा ओर लाड़ प्यार में पला हुआ।ख़ुशी के मारे उनके हाथ पैर काम नही कर रहे थे  पर बेटे के लिए लड्डू औऱ नमकीन बनाने में लग गई थी बेटे की खुशी हमेशा से उनके लिए सर्वोपरि रही है बेटे को बेसन के लड्डू बेहद  पसंद है औऱ अब वो इतने सालों बाद आ रहा है तो  खुश हो जाएगा ……
तैयारी करते करते वो सोचने लगी कि वरुण का मन हमेशा से ही बाहर  जाकर जॉब करने का था और पिता रामप्रसाद जी ने बैंक से लोन लेकर ओर एफ डी तोड़कर उसको बाहर भेजा ताकि वो अपना सपना पूरा कर सके और आगे बढ़ सके। और उसको खुश देखकर दोनो खुश रहे आखिर बेटे को उदास नही देखना चाहते थे माँ बाप…..
: उसके बाद वो ऑस्ट्रेलिया चला गया वहीं पर उसने शादी कर ली और एक प्यारे से बेटे ने जन्म लिया ।बीच  बीच मे वरुण से बात चलती रहती थी पर वहाँ से उसका आना बहुत मुश्किल था जॉब को छोड़कर  आना सही नही था इसी बीच पिता रामप्रसाद जी का भी  देहासवान हो गया । उनके जाने के बाद वो भी बहुत टूट चुकी थी। पिता के देहांत पर वरुण भी सिर्फ दो दिन के आया था ये सोचकर जानकी देवी की आँखे  डबडबा आई  और फिर वो एकदम से उदास हो गई।
चार दिन बाद जब वरुण घर लौटा तो बेटे को देखते ही माँ की आखों से खुशी के आँसू निकल पड़े।
बेटे वरुण को देखकर माँ के मुँह से  निकल पड़ा  “बेटा आज तुझे कितने सालो में देख रही हु कितना दुबला हो गया है तू कैसा हैं तू ”  वरुण ने जवाब दिया इतने दिनों बाद देख रही हो न माँ इसलिए ऐसा दिख रहा हु में बिल्कुल नही बदला आपका वही लाडला हूँ जो बचपन मे आपको परेशान किया करता था।
अच्छा देखो माँ मै तुम्हारे लिये क्या लाया हूँ माँ तो बस एकटक वरुण को ही देखे जा रही थी ।बेटे को सालो बाद देखकर उन्हे बहुत सुकून मिला जाने कब से वो  बेटे को देखने को तरस  रही थी। इसी तरह चार  पाँच दिन बीत गये जानकी देवी वरुण के लिए इनकी पसंद की चीज़ें बनाती उसका ख्याल रखती बेटा भी उनका पूरा धयान रख रहा था ।
फिर एक दिन……….
माँ इस बार तुम भी हमारे साथ चलो………
 कहाँ बेटा…………..
ऑस्ट्रेलिया  चलो अपने पोते औऱ बहु को भी  देख लेना……
हा देखना तो चाहती हूँ बेटा  पर अपना पुश्तेनी घर नही छोड़ सकती मेरी बहुत सी यादें जुड़ी है इस घर से एक मात्र निशानी रह गई है पुरखो की अब तो बस यही जीना यही मरना है………
 अरे माँ यहाँ अकेले क्या करोगी कौन देखभाल करेगा तुम्हारी हम सब बेच कर जायेगें औऱ सब वही पर साथ मे रहेंगे वहाँ पर तुम्हारा मन भी लग जागेगा।
 नही बेटा तुम्हारे पिता के साथ बिताये हुए हँसी खुशी के पल जुड़े है इस घर से ।डोली में बैठकर आयी थी अपने ससुराल मुझसे यहाँ से दूर न जा पाऊंगी
इस घर को छोड़कर कही नही जा सकती अब …….
i: माँ चलो वहाँ तुम्हारी देखभाल करने के लिए हम है यहाँ कौन है। बार बार बेटे को समझाने के बाद जानकी देवी बेटे के साथ जाने के लिए तैयार हो गई। बेटे ने सारी पुश्तैनी सम्पति को बेच दिया ऒर माँ को साथ ऑस्ट्रेलिया ले जाने की तैयार कर ली …दो दिन बाद सामान पैक कर वरुण माँ को लेकर हवाई अड्डे पर पहुँचा …..ओर कहा माँ आप  बैठो मै थोड़ी देर में आया। वो बोली ठीक है बेटा….
3- घंटे गुज़र गये सीट पर बैठेबैठे जानकी देवी अपने बेटे का इंतज़ार करती रही ……मगर वो नही आया इसके बाद आठ नौ घंटे गुज़र गये वो नही आया उनका दिल घबरा गया और वो उदास हो गई।
उनको रोता हुआ देखकर एक राहगीर उनके पास आया और बोला क्या हुआ माज़ी आप रो क्यो रही  है,?
वो बोली उनका बेटा उनको कुछ देर में आने के लिए बोलकर गया था मगर अभी तक  नही आया।
कही कुछ अनहोनी तो नही हो गई क्या करूँ मुझे कुछ समझ नही आ रहा है।उस राहगीर ने काउंटर पर जाकर उसके बेटे के बारे में पता किया तो उसको आश्चर्य हुआ ये  जानकर की उनका बेटा 6 घंटे पहले ही ऑस्ट्रेलिया के लिये रवाना हो चुका है और टिकिट भी उसने खुद का लिया था माँ का नही।
उस राहगीर ने आकर जानकी देवी को वताया कि “माजी आपका बेटा तो ऑस्ट्रेलिया जा चुका है”। आप अपना घर बताओ  मैं  आपको छोड़ दूंगा।।
: तब वह बोला मेरे पास तो कुछ नही बचा अब  रहने को घर नही है अब मुझको कौन सहारा देगा इस बुढ़ापे में अब कहाँ जाऊंगी मैं……
वो बदहवास हो गई और सोचने लगी क्या खुद उनका बेटा उनके साथ ये कर सकता है बुढ़ापे में उनको ये तकलीफ़ दे सकता है अब मुझे कौन सम्भालेगा ओर राहगीर  जानकी देवी को।वृद्धाश्रम छोड़कर आ गया। जानकी देवी सोचने लगी कि शायद मेरी परवरिश में ही कोई कमी रह गई जो मुझे आज यह दिन  देखना पड़ रहा है ये सोचकर उनकी आँख भर आई।
वो खुद से ही सवाल करने लगी उन्हें खुद समझ नही आ रहा था वो खुद अंदर से टूट चुकी थी उन्हें बेटे का इस तरह छोड़कर जाना उन्हें  गहरा आघात लगा था। फिर मन ही मन वह खुद को समझाने लगी कि जरूर उसकी कोई मजबूरी रही होंगी  नही तो वह ऐसा नही करता।ऒर उसके बाद जानकी देवी बेटे के वापस आने का इंतज़ार करने लगी उनके दिल मे अभी भी एक उम्मीद बची थी और सोचने लगी कि उनका बेटा एक दिन उनको जरूर लेने आएगा
नीरा  जैन जयपुर