जातिवाद और हमारा लोकतंत्र !

भारत को दुनिया के  सबसे  बड़े  लोकताँत्रिक  देश का दर्जा प्राप्त  हैं ! लोकतंत्र में शासन  सर्वोच्च शक्ति जनता में निहित  हैं !  जनता  अपने प्रतिनिधियों के   माध्यम से संचालित और क्रियान्वित करवाती हैं !

आज  हमारे देश में विभिन्न जातियों और धर्म से संबंधित लोगो के आवास होने के बावजूद आज भी हमारे देश में सौहार्द और आपसी सहयोग जैसी भावना में कोई कमी नहीं आई हैं ! लेकिन सोचने वाली बात यह हैं कि क्या हम एक दूसरे के प्रति समान भाव तथा सौहार्द रखते हैं ? किसी भी देश का सामाजिक और आर्थिक भविष्य उस देश की राजनीति के हाथों में होता हैं ! अगर राजनीति स्वच्छ और परिष्कृत हैं तो नागरिकों का जीवन स्तर तो सुधरता ही हैं  साथ ही साथ  मे एक दुसरे के प्रति सहयोग भावना  और समान हितों के प्रति जागरूकता में वृद्धि होती हैं ! लेकिन दुर्भाग्यवश भारतीय राजनीति उपरोक्त कसोटियो पर खरी नहीं उतरी !  हमारे लोकतंत्र   की एक  विकृति जातिवाद  की राजनीति हैं !सरकारे और राजनेतिक दल जातिवाद के खिलाफ आवाज़ उठाते हैं लेकिन व्यावहारिकता में जातिवाद का को बढ़ावा दिया जा रहा हैं ! चुनावों के दौरान टिकट वितरण में जातिवाद को  आधार बनाया जाता हैं ! लोकतंत्र में जातिवाद का कोई स्थान नहीं हैं लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान जातिवाद का इस्तेमाल किया जाता हैं ! लोगो को समझना होगा कि चुनाव लड़ने वाला ही जब जातिवाद जैसी संकीर्ण मानसिकता रखने वाला होगा तो देश का विकास कैसे होगा ! जातिवाद और राजनीति एक दूसरे के पूरक बन गए हैं ! इससे लोकतंत्र कमजोर होगा ! रजनेतिक दल अपने स्वार्थ के लिए देश में जातिवाद का जहर घोल रहे हैं ! आरक्षण के जरिये जातिवाद को मजबूत आधार दे दिया गया हैं ! प्रतिभा की जगह जाती के आधार पर नौकरी दी जा रही हैं !इससे चारो तरफ अव्यवस्था नजर आ रही हैं ! जब तक जातिवाद रहेगा लोकतंत्र मजबूत नहीं हो सकेगा ! जातिवाद ने समाज को विभाजित कर दिया हैं ! लोकतंत्र की आत्मा समता और न्याय में विश्वास करती हैं ! इसी वजह से आरक्षण का प्रावधान किया गया हैं ! यह  माना गया कि इसकी वजह से दलित वर्ग का उत्थान होगा ! संविधान निर्माता की भावना पुनीत थी लेकिन राजनीतिक दलों ने आरक्षण को हथियार बना लिया !  राजनीति में बढती बीमारी के इलाज का प्रयास हैं ! जातिवाद राजनीति में सफलता का मंत्र बन गया हैं ! असल में राजनैतिक दल अपनी नाकामियों को छिपाने के लिए जातिवाद का सहारा लेते हैं ! जातिवाद  से छुटकारा पाने की सख्त जरुरत हैं ! प्रत्येक व्यक्ति को सबसे पहले अपनी स्वय की  जाति से  बाहर  निकलना होगा ! देश की जनता को जाति एवं धर्म के नाम पर राजनीति करने वाले दलों  को  चुनावों में विरोध करना चाहिए और सहयोग करने के बजाय इनकी  वास्तविक सोच को जनता के सामने रखना चाहिए @ राजनीति में सर्व धर्म समभाव को अपनाना होगा !जनता को   जातिवाद से

    अलग हटकर  स्वतंत्र  विचार धारा रखकर  विकास  के मुद्दे को प्राथमिकता देनी होगी