नारी कभी  न  हारी  लेखिका साहित्य संस्थान

Nari kabhi na Hari

 

र लम्हा मै
सफलता औऱ विफलता के
मध्य झूलती रहती हूं
जीवन विफलताओं से भरा हैं
सफलता जब भी मेरे निकट आई
मैं स्वयं ही उससे दूर हो गई।
मन में थी एक बैचैनी
साथ मे कई सवाल
क्या मुझे सिर्फ सफल बनना है
बनानी है अपनी पहचान
लोग जिसे कहते विफलता
मंज़िले वही मेरे लिये बनी
पथ गामिनी नव दृष्टि
मंज़िले अनगिनत हैं।
बहुत दूर तक जाना
 रुकना नही
मुझको कही