नारी कमजोर नहीं
नारी कमजोर नहीं
न ही कम है
कर रही निरंतर सधंर्ष है।
उठने के लिए बढ़ने के लिए
आसमान छूने के लिये
 अपनी पहचान बनाने 
जूझ रही है अभाव की आधियों के थपेडों से 
अपनो क तानों से
गैरौ की तीखी चुभती भूखी नजरों से,
वो लड़ती है जूझती है
लड़खड़ाती है
गिरती है और संभलती है
अपनी कोमलता के साथ
अपने इरादों को देती मजबूती
अपने संस्कारों को,अपनी जड़ों को
 थामा है मजबूती से,
अडिग अचल रहकर,
नित जीवन पथ पर बढ़ती।
उसे विश्वास है एक दिन
मिलेगा संबल,
और अपने इरादों को सहारा
नारी न कमतर है न ही कमजोर