नारी मन 
 
उठता है मन 
में इक सवाल 
मनमें इक हूक।
सहके जुल्म
क्यों रहती 
नारी खामोश
अब तक मूक।
नही सुहाते अब मुझे
पायल कँगना
चाहे कुछ कहे
ये जमाना।
हिय में नेरे प्यास जगी
सितारों को पाने की
आस लगी।
चाँद को आँचल में
समेटने की ठानी ।
छोड़ घूँघट
तोड़ बेड़ियां
बन परवाज उड़ने की
मन ने जानी ।
कर बुलन्द हौसलों को 
बदलनी है अब
नारी जीवन की कहानी।
नारी को अपनी पहचान
है बनानी । 
सम्मान से जीने की 
नारी ने ठानी।।
नारी मन क्या चाहे
अब तो समझो पुरुष
वो भी खुशियी की 
अधिकारी ।
मत समझो कमजोर 
नारी को आगे बढने 
की उसने ठानी।
neera jain