मेरी प्रिय पुस्तक  आज़ादी मेरा ब्रांड”

दायित्व को रखना सिखाया है या यूं कहें कि बहुत सारी किताबो ने धीरे धीरे  मुझे पढ़ा है कुछ किताबें जीवन के रुख को बदल कर रख देती है ये अहसास कई साल बाद होता है जब पीछे मुड़ कर देखते है
मेरी  प्रिय पुस्तक 
“आज़ादी मेरा ब्रांड” दुनिया घूमकर अपना निजी स्पेस ढूढ़ती एक लड़की की कँहानी है।किताब की लेखिका अनुराधा बेनीवाल एक ऐसी ही लडक़ी है जिसने खुद को जीने की लत लगवाईं पूरी किताब लड़कियों के सम्मान के साथ जिंदा रहने की वकालत करती है किताब का एक अंश “क्यो चलने नही देते तुम।मुझे क्यों तुम्हे मैं अकेले चलते नही सुहाती? अनुराधा की किताब आज़ादी मेरा ब्रांड यूँ तो एक यात्रा वृतान्त है पर असल मे समाज मे विमर्श पैदा करती एक किताब है यहाँ नारीवाढ जैसा कोई बाद नही है बल्कि घूमने के दम पर लेखिका खुद लड़किया ओर पूरे समाज की सोच बदलने की चाह रखती है।”तुम चलोगे तो तुम्हारी बेटी भी चलेंगी मेरी बेटी भी जब जब साथ चलेगी तो सब आज़ाद बेफिक्र और बेपरवाह चलेगी”।
हरियाणा की लड़की यूरोप  में पर्यटक बनकर नही आज़ादी की  खुली हंवा में सांस  लेने गई। लेखिका ने अपनी घुमक्कड़ी की कहानी लिखी है जो अब स्त्री आज़ादी की परिभाषा बन गई है।
: यायावर बन के खुद परिभाषाएं गढ़ी जाये जिन्हें हमे खुद के अनुभव से जाना हो आज़ादी की तलाश में भटकना ही आज़ादी है यह तलाश हर आदमी को खुद करनी पड़ेगी।भीतर की मंज़िलो को हम बाहर चलते हए  भी छू सकते है। लेखिका उत्तर  नही देती प्रश्न पूछती है बेहद गंभीर और जायज  ” क्यो नही चलने देते तुम मुझे?”