मेरी यादो का गाँव

 

मेरी यादो का गाँव
कुछ  स्मृतिया,
मानस पटल पर शेष है अभी
वो बरगद का पेड़
जँहा झूलते थे हम
वो खेत और खलिहान 
जँहा खिलखिलाते थे हम,
वो माँ के हाथों का स्वाद 
नही मिला आज तक।
शेष है स्मृतियों में।
बहुत सादिया बीत गई 
मानो यूं लगता,
किसी पतंग की डोर लेने
सुधबुध होकर दौड़ा करती।
शेष है स्मृतियों में 
वो आँगन वो माटी की महक
आज भी महसूस करती हूँ
वो सखियों का साथ
घंटो बतियाती
खूबसूरत पल बीते
खेलती गुड्डे गुड़िया का खेल
वो नदी पार करके 
जाते थे स्कूल,
नही होती थी घकान
शेष है स्मृतियों में 
वो बारिश में
आँगन में खिले फूल 
गुलाब के 
महकते है आज भी
मेरी यादो में।
वो बरखा सुहानी
जिसमे भीगा तन मन
वो सावन के झूले
शेष है स्मृतियों में
वो बचपन वो मिट्टी के 
टूटे फूटे खिलोने
वो रस्सी वो गिल्ली डंडा
संजो के रखा है मैंने
उन यादों को 
वो सूरज की किरणे 
जब रेत पर पड़ती थी।
मन मे भरती उत्साह 
वो स्मृति पनघट की 
चेहरे पर मुस्कान लाती।
याद आते मुझको सब
भूल जाती सारे काम धाम
सच कितना प्यारा है ,
मेरी यादों का गाँव

 

 

 

 

 

 

ç