नारी  हु मै

नव निर्माण करुँगी।
आदि शक्ति हु मै।
सृष्टि  की
मिझसे तुम खिलवाड़ न करना।
रक्षक हु मेँ सरे जग की
मुझसे तुम खिलवाड़ न करना।
सपनो को साकार करुँगी।
समाज संस्कृति का मान रखूंगी।

समय

कोशिश तो करती हूँ पर
पकड़ नहीं पाती समय की चाल
निकल जाता हैं हमेशा हाथो से
रेत की तरह
हां नहीं समझ पाती
समय की चाल को।
जो मुझसे कही ज्यादा टेढ़ी हैं।
मै जो चाहती हूँ।
नहीं हो पाता  पूरा।
समय नहीं सुनता मेरी
समय अपनी ही करेगा।
हां इस वक्त के इशारे पर
मेरे अपने मुझसे दूर हो गए।
हो गई तनहा खामोश सी।
मै ठहरी रही जहा से चली।
 खुद से लड़ती रही।

पिता

मंदिर की घंटी
मस्जिद की अजान हैं पिता
तपते रेगिस्तान में एक बून्द
पानी हैं पिता
देते जीने का सम्बल
परिवार के चेहरे की
मुस्कान हैं पिता
बहार से भले ही कठोर
लगे पिता
अंदर से नरम दिल
होते पिता।
बच्चो पर सदा प्यार
लुटाते पिता
माना माँ पूजी जाती
जग में।
धरती अगर माँ तो
आसमान हैं पिता।
दुनिया में भगवान् से
काम नहीं पिता।
बच्चो के लिए खुशियों
का जंहा हैं पिता।

कविताये होती हैं सूंदर

कविताये होती हैं सूंदर
रचती हैं नया कुछ
देती हैं असीम आकाश
जताती हैं अपना महत्व
लगती हैं परायो में अपनी सी
फैला हुआ हैं उनका कुनबा
जगह जगह उनका वास
हर जगह विचरती हैं
कविताएं अठखेली करती हैं
कविताएं खानाबदोश होती हैं।
झरने से निकली पवित्र आत्मा
होती कविता।
जो हैं पारखी आँखे तो
पूछ लो उनको
वफादार होती कविता
कभी कोई नहीं होता तो
अपनी सी लगती कविता।

दस्तक

दस्तक मेरे दर पे
दस्तक मेरे दिल पे
तुम्हारे आने की आहट
मुझे अच्छी लगती हैं।
जज्बातो की या अहसासों की
दस्तक मुझे अच्छी लगती हैं।
उम्मीद की हो या होंसले की
दस्तक मुझे अच्छी लगती हैं।
जीवन का संगीत हो तुम
प्यारी सी प्रीत हो तुम
तुम्हारे आने की आहट
मुझे अच्छी लगती हैं।

तुम नहीं मिलते तो

तुम नहीं मिलते तो भी
मैं नदी तक जाती
छूती इसके ह्रदय को
गाती बचपन का कोई गीत
 मिलते तो भी
पहाड़ो के सारः घंटो बतियाती
वृक्षों का हाथ पकड़कर
ऊपर की और उठना सीखती।