किशोरावस्था मानसिक  मे  तनाव  क्यूँ  और कैसे दूर करे

                                                                 

 किशोरावस्था एडोलसेंस नामक अंग्रेजी के शब्द का हिंदी रूपांतरण है जिसका अर्थ है परिपक्वता की ओर बढ़ना। यह अवस्था 12 से 19 वर्ष तक की मानी गई है।इस अवस्था के बच्चे ना तो बड़ों की श्रेणी में आते हैं और ना ही छोटों की ।या फिर हम इस प्रकार कह सकते हैं कि छोटे से बड़े बनने की प्रक्रिया ही किशोरावस्था की समयावधि है।
 
 इस अवस्था में किशोरों व किशोरियों में विभिन्न प्रकार के शारीरिक और मानसिक परिवर्तन होते हैं जिसका प्रभाव बच्चों पर विशिष्ट रुप से पड़ता है। जैसे– लड़कियों में इस अवस्था में एक संकोच की भावना उत्पन्न हो जाती है और वह अपने आप को समाज के सामने असहज महसूस करती हैं, इसके विपरीत लड़कों में आत्मविश्वास की भावना अधिक प्रबल हो जाती है और उनमें निर्णय लेने की क्षमता भी बढ़ती है ।शारीरिक परिवर्तन के साथ ही बच्चों पर मानसिक बौद्धिक तथा संज्ञानात्मक विकास भी होता है, जो उनके जीवन चरित्र को प्रभावित करता है। इस उम्र में उन्हें संगीत साहित्य कला आदि के प्रति रुचि का भी विकास होता है ।इन सबके साथ ही उनमें यौन विकास भी होता है। आधुनिक  मनोवैज्ञानिकों का मत है कि किशोरों के काम प्रवृति को अच्छी दिशा की ओर परिवर्तित अथवा परिमार्जित करने के लिए शिक्षा देना नितांत आवश्यक है, अन्यथा वह गलत दिशा की ओर मुड़ जाएंगे जो कि बहुत हानिकारक है ।इसअवस्था में बच्चों पर किस प्रकार मानसिक दबाव रहता है उन्हें मैं कुछ बिंदुओं के आधार पर आने का प्रयास करूंगी ।जैसे —-
1-खानपान —-खानपान का  हमारे जीवन में बहुत असर पड़ता है ।जैसे कि कहा गया है ।जैसा खाओ अन्न वैसा होए मन। आजकल जंक फूड ने इस कदर बच्चों को लुभाया है कि वह पौष्टिक भोजन के प्रति बेपरवाह होते जा रहे हैं जिससे उनके स्वास्थ्य पर तो असर पड़ता ही है और उनके सोच विचारों की शक्ति भी प्रभावित होती हैं।
2– मोबाइल का आकर्षण– मोबाइल के प्रति बढ़ता आकर्षण भी मानसिक तनाव का कारण है नेट पर अधिक देर व्यस्त रहने, गेम खेलने से उनका पढ़ाई के प्रति ध्यान केन्द्रित  नहीं हो पाता जिससे परीक्षा में अधिक नंबर नआने के कारण भी मानसिक तनाव का शिकार हो जाते है।

 

3–पारिवारिक वातावरण—- पारिवारिक वातावरण का प्रभाव बच्चों पर बहुत पड़ता है। यदि घर में आपसी कलह एवं हिंसा का वातावरण है तो बच्चों का मानसिक विकास प्रभावित होता है और साथ ही जब माता-पिता बच्चों से बहुत ज्यादा की अपेक्षा रखते हैं और  वह इतना सक्षम नहीं हो पाता तो ऐसी स्थितियां भी बच्चों के लिए प्रतिकूल हो जाती हैं ।कभी-कभी परिवार में उचित मार्गदर्शन ना मिलने के कारण भी बच्चा मानसिक विकार का शिकार हो जाता है।

4— सामाजिक वातावरण —घर में उचित प्यार ना मिलने के कारण भी बच्चे के मन में नकारात्मक विचार आने लगते हैं और वह यारी दोस्ती में गलत संगत में पड़ जाता है और व्यसनों  का शिकार हो जाता है ।

 

5– सपने के अनुपात में कम परिश्रम—- प्रतिस्पर्धा के इस युग में आगे बढ़ने की होड़ लगी रहती है जो ज्यादा मेहनत कर जाता है वह तो अपना लक्ष्य पा जाता है और जो बच्चे कम परिश्रम करते हैं और अपनी मंजिल को नहीं पा पाते यह स्थितियां उनके लिए काफी दुरूह  हो जाती हैं ।वह हिंसक और उन्मादी प्रवृत्ति के हो जाते हैं।

6— विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण— इस उम्र में बच्चों में कामुक प्रवृत्ति अधिक सक्रिय हो जाती है जो उन्हे दिवास्वप्न की दुनिया में ले जाता है ।उचित मार्गदर्शन ना मिलने से वह मार्ग से भटक जाते हैं जो कि उनके लक्ष्य प्राप्ति में बाधक बनता है।

 

7—-गलत संगत का प्रभाव —–उचित दोस्त ना होने के कारण बच्चा गलत संगत में पड़ जाता है। चोरी, अपराध जैसी विसंगतियों में पड़कर अपना भविष्य नष्ट कर देता है ,जो आगे उसके मानसिक विकार का कारण बनता है।

   इस  प्रकार  हम देखते हैं कि किशोरावस्था एक बहुत ही नाजुक अवस्था है जिसमें हमें अपने बच्चों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है ।वह क्या सोचते हैं ,उनका क्या लक्ष्य है, वह क्या करना चाहते हैं। इन बातों पर हमे उनसे  खुल कर बात करनी चाहि । हमें अपने बच्चों के साथ मित्रवत व्यवहार रखना चाहिए ताकि वह कुमार्ग की ओर ना जाए और अपने लक्ष्य प्राप्ति में प्रवृत्त हो। उनमें  प्रारंभ से ही नैतिक गुणों का विकास करना चाहिए ।जैसे
 कि बड़ों का सम्मान करना, छोटों को प्यार देना, *सबसे अहम बात लड़कियों के प्रति आदर का भाव रखना* उनके  खानपान का विशेष ध्यान देना। योग और व्यायाम के प्रति आकर्षित करना। दोस्तों के साथ मित्रवत व्यवहार करना —-जैसी बातें उनके चारित्रिक विकास को उन्नत करेंगी,  और भारत देश को एक सच्चा, शक्तिशाली, प्रभावशाली व्यक्तित्व से भरपूर युवा प्रदान karegi.